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भूपेन हजारिका के बेटे नहीं लेंगे पिता का भारत रत्न, नागरिकता विधेयक के विरोध में फैसला

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। देश के सबसे बड़े पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित भूपेन हजारिका के बेटे ने उनके पिता को दिया जा रहा यह सम्मान लेने से इनकार कर दिया है। 25 जनवरी को पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, जनसंघ के नेता नाना जी देशमुख और प्रख्‍यात गायक, संगीतकार और गीतकार भूपेन हजारिका को भारत रत्न सम्मान देने का एलान किया गया था। नागरिकता संशोधन विधेयक-2016 के विरोध में हजारिका के बेटे ने इतना बड़ा फैसला लिया है।

हालांकि हजारिका का परिवार अवॉर्ड वापसी को लेकर एकमत दिखाई नहीं दे रहा है। भूपेन हजारिका के बेटे तेज हजारिका जो अभी अमेरिका में है ने असम के एक स्थानीय न्यूज चैनल से बात करते हुए कहा कि वह मरणोपरांत अपने पिता को दिए गए भारत रत्न को स्वीकार नहीं करेंगे। नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में उन्होंने ये फैसला लिया है। वहीं भूपेन हजारिका के भाई समर हजारिका ने कहा कि भारत रत्न लौटाने का फैसला तेज का अपना फैसला है, मेरा नहीं। खैर, मुझे लगता है कि भूपेन हजारिका को भारत रत्न मिलना चाहिए। पहले ही बहुत देर हो चुकी है।

भूपेन हजारिका भारत के ऐसे विलक्षण कलाकार थे जो अपने गीत खुद लिखते थे, संगीतबद्ध करते थे और गाते थे। हजारिका को 1975 में सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1987), प्रतिष्ठित दादा साहेब फाल्के पुरस्कार (1992), पद्मश्री (1977) और पद्मभूषण (2001) से भी सम्मानित किया जा चुका है। 5 नवंबर 2011 को उनका देहांत हो गया था।

इससे पहले नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में मणिपुरी फिल्म निर्माता अरिबाम श्याम शर्मा ने पद्मश्री अवॉर्ड वापस लौटाने का ऐलान किया था। 83 वर्षीय फिल्म निर्माता और म्यूजिक कंपोजर अरिबाम को वर्ष 2006 में यह पुरस्कार मिला था। अरिबाम के अवॉर्ड वापसी के ऐलान ने एक बार फिर 'सहिष्णुता-असहिष्णुता' को लेकर लंबे समय से चल रही बहस को शुरू कर दिया था। इससे पहले 2015 में 50 से अधिक साहित्यकारों ने अपने पुरस्कार यह कहते हुए वापस कर दिए थे कि मोदी सरकार के आने के बाद देश में असहिष्णुता बढ़ गई है।

बता दें कि केंद्र सरकार 1955 में आए नागरिकता कानून बिल में संशोधन करना चाहती है। इस कानून के अनुसार पहले बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान जैसे पड़ोसी देश से आए रिफ्यूजी को 12 साल देश में गुजारने के बाद नागरिकता मिलती है। हालांकि केंद्र सरकार इसको संशोधित कर इसके टाइम लिमिट को घटाना चाहती है। संशोधन के बाद 12 साल के बजाय 6 साल भारत में गुजारने पर नागरिकता मिल सकेगी। नॉर्थ-ईस्ट के लोग इसके खिलाफ हैं और इस बिल का विरोध कर रही हैं।

विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि इस बिल का सबसे ज्यादा असर असम और मणिपुर समेत सभी पुर्वोत्तर राज्य पर पड़गा। लोगों का कहना है कि बांग्लादेशी लोगों के आने से असम और कई राज्यों के संस्कृति पर असर पड़ेगा।